समर्थन मूल्य पर धान खरीदी में किसान बेहाल: सहूलियत के निर्देश कागज़ों में ! सात केंद्रों पर अंतिम चरम पर मार्कफेड से मिले कैमरे

 

*विशाल सिंह* /कोरिया - जिला प्रशासन के तमाम दावों और बैठकों में जारी निर्देशों के बावजूद जिले में समर्थन मूल्य पर चल रही धान खरीदी की जमीनी हकीकत बेहद निराशाजनक है। किसानों की सहूलियत के लिए कलेक्टर सहित जिला प्रशासन द्वारा बार-बार दिशा-निर्देश दिए गए, लेकिन भौतिक धरातल पर उनका असर नजर नहीं आ रहा है।जिले के कई धान खरीदी केंद्रों पर सहकारी समितियों के प्रबंधकों द्वारा किसानों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के बजाय उनसे ही वारदाना भरवाना, धान तौलवाना और बोरा पलटी जैसे कार्य कराए जा रहे हैं। मजबूरी में किसान अपनी उपज बेचने के लिए यह सब सहन कर रहे हैं और खामोशी से शोषण झेलने को विवश हैं। भले ही कलेक्टर कोरिया ने जिले के 21 धान खरीदी केंद्रों में समिति में हमाली रखने व पैसा किसानों को नही देने का निर्देश दिया हैं किंतु यह निर्देश केवल कार्यालय की चार दीवारों तक ही सीमित रहकर रह गई आज भी जिले के समिति में किसान हमाली के रूप में 10 से 15 रुपये देने को विवश हैं वही अब किसानों को सहलुहियत के लिए निगरानी के लिये चयनित जिम्मेदार अब नदारत रहते है ।

सबसे खराब हालात बड़े कलुआ ,जिल्दा ,पटना ,सरभोका और तरगवा धान खरीदी केंद्रों में देखे जा रहे हैं, जहां व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा चुकी हैं। यहां न तो बैठने की उचित व्यवस्था है न ही हमालों को किसी का डर और न ही पारदर्शी ढंग से खरीदी की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।गौर करने वाली बात यह है कि धान खरीदी शुरू हुए एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, जिससे स किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह स्थिति खरीदी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर रही है।इन तमाम अव्यवस्थाओं से परेशान किसानों ने जिला प्रशासन से धान खरीदी केंद्रों पर किसानों के हितों की सुरक्षा, शोषण पर रोक और आवश्यक सुविधाएं तत्काल मुहैया कराने की मांग की है। किसानों का कहना है कि यदि वे विरोध करते हैं तो उन्हें ही परेशान किया जाता हैं जिस कारण किसान ही विरोध नही कर पा रहे ।

वही दूसरे और कोरिया जिले में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का अभियान अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। जैसे-जैसे समय कम हो रहा है, उपार्जन केंद्रों पर किसानों की बेचौनी और भीड़ दोनों बढ़ने लगी है। साथ ही उठाव की धीमी चाल से उठाव व खरीदी में समिति को जगह को लेकर असुविधा होने की पूरी संभावना हैं जबकि खरीदी के लिए अब कैलेंडर के हिसाब से केवल छुटी को छोड़ दे दो लगभग 21 दिन खरीदी के शेष बचे होने की बात कही जा रही , लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है। धान खरीदी के शुरूआत के साथ ही जिले के कई खरीदी केन्द्रों में सीसीटीवी लगा दिए गए थे, अब चुकि धान खरीदी कुछ ही दिन शेष है ऐसे में रायपुर से सीसीटीवी कैमरे की खरीदी कर लगभग सात से ग्यारह केन्द्रों में भेजवाए जाने की चर्चा है जो कि लगे भी नही हैं जिसका औचित्य लोगो को समझ नही आ रहा है। जबकि धान खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए प्रशासन ने केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश पूर्व में दिए थे। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जिले में जब आधे से ज्यादा धान की खरीदी पूरी हो चुकी है, और जिले के लगभग सभी धान खरीदी केन्द्रों मे सीसीटीवी कैमेरा लगा लिए गए थे, तब जाकर राज्यों में मार्कफेड द्वारा कैमरे भेजवाए जा रहे हैं।वही भेजे गए कैमरे पुराने होने की संभावना हैं क्यो की यह कैमरे पूर्व में उपयोग किये जा जा चुके हैं जो कि लगा रहे आपरेटर ने यह बात कही वही समिति प्रबंधन भी कुछ भी कहने से बचते नजर आ रहे । ऐसे में इस लेट-लतीफी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं क्या यह औपचारिकता मात्र है या कमीशनखोरी का एक नया जुगाड़ जिससे कैमरे की गुडवत्ता व लगने को लेकर सवाल उठना लाजमी हैं ।


 *केवल कागजी खानापूर्ति तो नही - सवाल यह उठना लाजमी हैं कि जब जिले के कई खरीदी* केंद्रों में पूर्व में खरीदी किये गए कैमरे वर्तमान में चालू हैं वही गड़बड़ी की इतना ही अंदेशा था तो खरीदी अपने चरम पर थी और निगरानी की सबसे ज्यादा जरूरत सुरु में थी, तब कैमरे मार्कबफेड को लगाए जाने थे। अब आधे काम के बाद कैमरे लगाने का क्या औचित्य? जबकि जिले के अधिकांश धान खरीदी केन्द्रों में प्रारंभ से ही सीसीटीवी कैमरे का इंतेजाम कर लिया गया हैं फिर दोबारा खर्च करने की आवश्यकता क्यों?

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